वाल्मीकि रामायण 2.100.44
कच्चिच्चित्यशतैर्जुष्ट: सुनिविष्टजनाकुल: ।देवस्थानै: प्रपाभिश्च तटाकैश्चोपशोभित:॥
kacciccityaśatairjuṣṭa: suniviṣṭajanākula: |devasthānai: prapābhiśca taṭākaiścopaśobhita: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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