वाल्मीकि रामायण 2.100.45
प्रहृष्टनरनारीक: समाजोत्सवशोभित: ।सुकृष्टसीमा पशुमान् हिंसाभि: परिवर्जित:॥
prahṛṣṭanaranārīka: samājotsavaśobhita: |sukṛṣṭasīmā paśumān hiṃsābhi: parivarjita: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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