वाल्मीकि रामायण 2.100.58
गृहीतश्चैव पृष्टश्च काले दृष्ट: सकारण: ।कच्चिन्न मुच्यते चोरो धनलोभान्नरर्षभ॥
gṛhītaścaiva pṛṣṭaśca kāle dṛṣṭa: sakāraṇa: |kaccinna mucyate coro dhanalobhānnararṣabha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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