वाल्मीकि रामायण 2.100.59
व्यसने कच्चिदाढ्यस्य दुर्गतस्य च राघव ।अर्थं विरागा: पश्यन्ति तवामात्या बहुश्रुता:॥
vyasane kaccidāḍhyasya durgatasya ca rāghava |arthaṃ virāgā: paśyanti tavāmātyā bahuśrutā: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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