वाल्मीकि रामायण 2.100.5
चिरस्य बत पश्यामि दूराद्भरतमागतम् ।दुष्प्रतीकमरण्ये ऽस्मिन् किं तात वनमागत:॥
cirasya bata paśyāmi dūrādbharatamāgatam |duṣpratīkamaraṇye 'smin kiṃ tāta vanamāgata: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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