वाल्मीकि रामायण 2.100.76
कच्चित् स्वादु कृतं भोज्यमेको नाश्नासि राघव ।कच्चिदाशंसमानेभ्यो मित्रेभ्य: सम्प्रयच्छसि॥
kaccit svādu kṛtaṃ bhojyameko nāśnāsi rāghava |kaccidāśaṃsamānebhyo mitrebhya: samprayacchasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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