वाल्मीकि रामायण 2.102.42
वराहवृकसङ्घाश्च महिषा: सर्प्पवानरा: ।व्याघ्रगोकर्णगवया: वित्रेसु: पृषतैः सह॥
varāhavṛkasaṅghāśca mahiṣā: sarppavānarā: |vyāghragokarṇagavayā: vitresu: pṛṣataiḥ saha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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