Loading
वाल्मीकि रामायण 2.102.48
स तत्र कांच्चित् परिषस्वजे नरान्नराश्च केचित्तु तमभ्यवादयन् ।चकार सर्वान् सवयस्य बान्धवान् यथार्हमासाद्य तदा नृपात्मज:॥
sa tatra kāṃccit pariṣasvaje narānnarāśca kecittu tamabhyavādayan |cakāra sarvān savayasya bāndhavān yathārhamāsādya tadā nṛpātmaja: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें