वाल्मीकि रामायण 2.103.2
राजपत्न्यश्च गच्छन्त्यो मन्दं मन्दाकिनीं प्रति ।ददृशुस्तत्र तत्तीर्थं रामलक्ष्मणसेवितम्॥
rājapatnyaśca gacchantyo mandaṃ mandākinīṃ prati |dadṛśustatra tattīrthaṃ rāmalakṣmaṇasevitam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें