वाल्मीकि रामायण 2.104.2
किमेतदिच्छेयमहं श्रोतुं प्रव्याहृतं त्वया ।यस्मात्त्वमागतो देशमिमं चीरजटाजिनी॥
kimetadiccheyamahaṃ śrotuṃ pravyāhṛtaṃ tvayā |yasmāttvamāgato deśamimaṃ cīrajaṭājinī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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