वाल्मीकि रामायण 2.105.21
आत्मानमनुशोच त्वं किमन्यमनुशोचसि ।आयुस्ते हीयते यस्य स्थितस्य च गतस्य च॥
ātmānamanuśoca tvaṃ kimanyamanuśocasi |āyuste hīyate yasya sthitasya ca gatasya ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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