वाल्मीकि रामायण 2.105.3
तूष्णीं ते समुपासीना न कश्चित्किञ्चिदब्रवीत् ।भरतस्तु सुहृन्मध्ये रामं वचनमब्रवीत्॥
tūṣṇīṃ te samupāsīnā na kaścitkiñcidabravīt |bharatastu suhṛnmadhye rāmaṃ vacanamabravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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