वाल्मीकि रामायण 2.105.32
धर्मात्मा स शुभै: कृत्स्नै: क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ।धूतपापो गत: स्वर्गं पिता न: पृथिवीपति:॥
dharmātmā sa śubhai: kṛtsnai: kratubhiścāptadakṣiṇaiḥ |dhūtapāpo gata: svargaṃ pitā na: pṛthivīpati: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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