वाल्मीकि रामायण 2.105.43
तद्वच: पितुरेवाहं सम्मतं धर्मचारिण: ।कर्मणा पालयिष्यामि वनवासेन राघव॥
tadvaca: piturevāhaṃ sammataṃ dharmacāriṇa: |karmaṇā pālayiṣyāmi vanavāsena rāghava ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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