वाल्मीकि रामायण 2.105.7
सुजीवं नित्यशस्तस्य य: परैरुपजीव्यते ।राम तेन तु दुर्जीवं य: परानुपजीवति॥
sujīvaṃ nityaśastasya ya: parairupajīvyate |rāma tena tu durjīvaṃ ya: parānupajīvati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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