वाल्मीकि रामायण 2.108.16
दानसंवनना ह्येते ग्रन्था मेधाविभि: कृता: ।यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व सन्त्यज॥
dānasaṃvananā hyete granthā medhāvibhi: kṛtā: |yajasva dehi dīkṣasva tapastapyasva santyaja ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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