वाल्मीकि रामायण 2.108.7
पित्र्यं राज्यं परित्यज्य स नार्हसि नरोत्तम ।आस्थातुं कापथं दु:खं विषमं बहुकण्टकम्॥
pitryaṃ rājyaṃ parityajya sa nārhasi narottama |āsthātuṃ kāpathaṃ du:khaṃ viṣamaṃ bahukaṇṭakam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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