वाल्मीकि रामायण 2.109.23
श्रेष्ठं ह्यनार्यमेव स्याद्यद्भवानवधार्य्य माम् ।आह युक्तिकरैर्वाक्यैरिदं भद्रं कुरुष्व ह॥
śreṣṭhaṃ hyanāryameva syādyadbhavānavadhāryya mām |āha yuktikarairvākyairidaṃ bhadraṃ kuruṣva ha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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