वाल्मीकि रामायण 2.109.29
शतं क्रतूनामाहृत्य देवराट् त्रिदिवङ्गत: ।तपांस्युग्राणि चास्थाय दिवं याता महर्षय:॥
śataṃ kratūnāmāhṛtya devarāṭ tridivaṅgata: |tapāṃsyugrāṇi cāsthāya divaṃ yātā maharṣaya: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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