वाल्मीकि रामायण 2.109.3
निर्मर्यादस्तु पुरुष: पापाचारसमन्वित: ।मानं न लभते सत्सु भिन्नचारित्रदर्शन:॥
nirmaryādastu puruṣa: pāpācārasamanvita: |mānaṃ na labhate satsu bhinnacāritradarśana: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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