वाल्मीकि रामायण 2.114.16
विपुलां विततां चैव युक्तपाशां तरस्विनाम् ।भूमौ बाणैर्विनिष्कृत्तां पतितां ज्यामिवायुधात्॥
vipulāṃ vitatāṃ caiva yuktapāśāṃ tarasvinām |bhūmau bāṇairviniṣkṛttāṃ patitāṃ jyāmivāyudhāt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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