वाल्मीकि रामायण 2.114.3
राहुशत्रो: प्रियां पत्नीं श्रिया प्रज्वलितप्रभाम् ।ग्रहेणाभ्युत्थिते नैकां रोहिणीमिव पीडिताम्॥
rāhuśatro: priyāṃ patnīṃ śriyā prajvalitaprabhām |graheṇābhyutthite naikāṃ rohiṇīmiva pīḍitām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें