वाल्मीकि रामायण 2.115.2
नन्दिग्रामं गमिष्यामि सर्वानामन्त्रये ऽद्य व: ।तत्र दु:खमिदं सर्वं सहिष्ये राघवं विना॥
nandigrāmaṃ gamiṣyāmi sarvānāmantraye 'dya va: |tatra du:khamidaṃ sarvaṃ sahiṣye rāghavaṃ vinā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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