वाल्मीकि रामायण 2.116.7
कच्चिच्छुश्रूषमाणा व: शुश्रूषणपरा मयि ।प्र(म)मादाभ्युचितां वृत्तिं सीता युक्तं न वर्तते॥
kaccicchuśrūṣamāṇā va: śuśrūṣaṇaparā mayi |pra(ma)mādābhyucitāṃ vṛttiṃ sītā yuktaṃ na vartate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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