वाल्मीकि रामायण 2.117.13
एवं ब्रुवाणं तमृषिं तथेत्युक्त्वा स राघव: ।सीतामुवाच धर्मज्ञामिदं वचनमुत्तमम्॥
evaṃ bruvāṇaṃ tamṛṣiṃ tathetyuktvā sa rāghava: |sītāmuvāca dharmajñāmidaṃ vacanamuttamam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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