वाल्मीकि रामायण 2.117.5
सो ऽत्रेराश्रममासाद्य तं ववन्दे महायशा: ।तं चापि भगवानत्रि: पुत्रवत् प्रत्यपद्यत॥
so 'trerāśramamāsādya taṃ vavande mahāyaśā: |taṃ cāpi bhagavānatri: putravat pratyapadyata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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