वाल्मीकि रामायण 2.118.14
नियमैर्विविधैराप्तं तपो हि महदस्ति मे ।तत्संश्रित्य बलं सीते छन्दये त्वां शुचिस्मिते॥
niyamairvividhairāptaṃ tapo hi mahadasti me |tatsaṃśritya balaṃ sīte chandaye tvāṃ śucismite ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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