वाल्मीकि रामायण 2.118.34
पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता ।चिन्तामभ्यगमद्दीनो वित्तनाशादिवाधन:॥
patisaṃyogasulabhaṃ vayo dṛṣṭvā tu me pitā |cintāmabhyagamaddīno vittanāśādivādhana: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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