वाल्मीकि रामायण 2.118.50
ततो ऽहं तत्र रामाय पित्रा सत्याभिसन्धिना ।निश्चिता दातुमुद्यम्य जलभाजनमुत्तमम्॥
tato 'haṃ tatra rāmāya pitrā satyābhisandhinā |niścitā dātumudyamya jalabhājanamuttamam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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