वाल्मीकि रामायण 2.14.12
उद्भ्रान्त ह्Rदयः च अपि विवर्ण वनदो अभवत् ।स धुर्यो वै परिस्पन्दन् युग चक्र अन्तरम् यथा॥
udbhrānta hRdayaḥ ca api vivarṇa vanado abhavat |sa dhuryo vai parispandan yuga cakra antaram yathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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