वाल्मीकि रामायण 2.14.27
सिक्तसंमार्जितपथां पताकोत्तमभूषिताम् ।विचित्रकुसुमाकीर्णां नानास्रग्भिर्विराजिताम्॥
siktasaṃmārjitapathāṃ patākottamabhūṣitām |vicitrakusumākīrṇāṃ nānāsragbhirvirājitām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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