वाल्मीकि रामायण 2.14.62
तदा सुमन्त्रम् मन्त्रज्ञा कैकेयी प्रत्युवाच ह ।सुमन्त्र राजा रजनीं रामहर्षसमुत्सुकः॥
tadā sumantram mantrajñā kaikeyī pratyuvāca ha |sumantra rājā rajanīṃ rāmaharṣasamutsukaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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