वाल्मीकि रामायण 2.16.2
प्रास कार्मुक बिभ्रद्भिर् युवभिर् मृष्ट कुण्डलैः ।अप्रमादिभिर् एक अग्रैः स्वनुरक्तैः अधिष्ठिताम्॥
prāsa kārmuka bibhradbhir yuvabhir mṛṣṭa kuṇḍalaiḥ |apramādibhir eka agraiḥ svanuraktaiḥ adhiṣṭhitām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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