वाल्मीकि रामायण 2.16.31
प्रययौ तूर्णम् आस्थाय राघवो ज्वलितः श्रिया ।स पर्जन्यैव आकाशे स्वनवान् अभिनादयन्॥
prayayau tūrṇam āsthāya rāghavo jvalitaḥ śriyā |sa parjanyaiva ākāśe svanavān abhinādayan ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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