वाल्मीकि रामायण 2.17.1
स रामः रथम् आस्थाय सम्प्रह्Rष्ट सुह्Rज् जनः ।पताकाध्वजसंपन्नं महार्हगुरुधूपितम्॥
sa rāmaḥ ratham āsthāya samprahRṣṭa suhRj janaḥ |patākādhvajasaṃpannaṃ mahārhagurudhūpitam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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