वाल्मीकि रामायण 2.17.11
यथा पश्याम निर्यान्तम् रामम् राज्ये प्रतिष्ठितम् ।ततः हि न प्रियतरम् न अन्यत् किम्चित् भविष्यति॥
yathā paśyāma niryāntam rāmam rājye pratiṣṭhitam |tataḥ hi na priyataram na anyat kimcit bhaviṣyati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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