वाल्मीकि रामायण 2.18.2
स पितुः चरणौ पूर्वम् अभिवाद्य विनीतवत् ।ततः ववन्दे चरणौ कैकेय्याः सुसमाहितः॥
sa pituḥ caraṇau pūrvam abhivādya vinītavat |tataḥ vavande caraṇau kaikeyyāḥ susamāhitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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