वाल्मीकि रामायण 2.19.5
हितेन गुरुणा पित्रा क्Rतज्ञेन न्Rपेण च ।नियुज्यमानो विश्रब्धम् किम् न कुर्यात् अहम् प्रियम्॥
hitena guruṇā pitrā kRtajñena nRpeṇa ca |niyujyamāno viśrabdham kim na kuryāt aham priyam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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