वाल्मीकि रामायण 2.2.10
सोऽहं विश्रममिच्छामि पुत्रं कृत्वा प्रजाहिते ।सन्निकृष्टानिमान् सर्वाननुमान्य द्विजर्षभान्॥
so'haṃ viśramamicchāmi putraṃ kṛtvā prajāhite |sannikṛṣṭānimān sarvānanumānya dvijarṣabhān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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