वाल्मीकि रामायण 2.2.17
इति बृवन्तं मुदिताः प्रत्यनन्दन् नृपा नृपम् ।वृष्तिमन्तं महामेघं नर्दन्त इव बर्हिणः॥
iti bṛvantaṃ muditāḥ pratyanandan nṛpā nṛpam |vṛṣtimantaṃ mahāmeghaṃ nardanta iva barhiṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें