वाल्मीकि रामायण 2.2.18
स्निग्धोऽनुनादी सम्जजञे तत्र हर्षसमीरितः ।जनौघोद्घुष्टसन्नादो विमानं कम्पयन्निव॥
snigdho'nunādī samjajañe tatra harṣasamīritaḥ |janaughodghuṣṭasannādo vimānaṃ kampayanniva ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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