वाल्मीकि रामायण 2.2.21
अनेकवर्षसाहस्रो वृद्धस्त्त्वमसि पार्थिव ।स रामं युवराजानमभिषिञ्चस्व पार्थिवम्॥
anekavarṣasāhasro vṛddhasttvamasi pārthiva |sa rāmaṃ yuvarājānamabhiṣiñcasva pārthivam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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