वाल्मीकि रामायण 2.2.25
कथं नु मयि धर्मेण पृथिवीमनुशासति ।भवन्तो द्रष्टुमिच्छन्ति युवराजं ममात्मजम्॥
kathaṃ nu mayi dharmeṇa pṛthivīmanuśāsati |bhavanto draṣṭumicchanti yuvarājaṃ mamātmajam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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