वाल्मीकि रामायण 2.2.31
धर्मजजञः सत्यसन्धश्च शीलवाननसूयकः ।क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्ह्णः कृतजञो विजितेन्द्रियः॥
dharmajajañaḥ satyasandhaśca śīlavānanasūyakaḥ |kṣāntaḥ sāntvayitā ślakṣhṇaḥ kṛtajaño vijitendriyaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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