वाल्मीकि रामायण 2.2.43
उत्तरोत्तरयुक्तौ च वक्ता वाचस्पतिर्यथा ।सुभ्रूरायतताम्राक्ष्हस्साक्ष्हाद्विष्णुरिव स्वयम्॥
uttarottarayuktau ca vaktā vācaspatiryathā |subhrūrāyatatāmrākṣhassākṣhādviṣṇuriva svayam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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