वाल्मीकि रामायण 2.20.35
सा राघवम् उपासीनम् असुख आर्ता सुख उचिता ।उवाच पुरुष व्याघ्रम् उपश्Rण्वति लक्ष्मणे॥
sā rāghavam upāsīnam asukha ārtā sukha ucitā |uvāca puruṣa vyāghram upaśRṇvati lakṣmaṇe ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें