वाल्मीकि रामायण 2.22.13
मयि चीर अजिन धरे जटा मण्डल धारिणि ।गते अरण्यम् च कैकेय्या भविष्यति मनः सुखम्॥
mayi cīra ajina dhare jaṭā maṇḍala dhāriṇi |gate araṇyam ca kaikeyyā bhaviṣyati manaḥ sukham ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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