वाल्मीकि रामायण 2.24.2
अदृष्ट दुह्खो धर्मात्मा सर्व भूत प्रियम् वदः ।मयि जातः दशरथात् कथम् उन्चेन वर्तयेत्॥
adṛṣṭa duhkho dharmātmā sarva bhūta priyam vadaḥ |mayi jātaḥ daśarathāt katham uncena vartayet ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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