वाल्मीकि रामायण 2.27.11
सुखम् वने निवत्स्यामि यथा एव भवने पितुः ।अचिन्तयन्ती त्रीम्ल् लोकामः चिन्तयन्ती पति व्रतम्॥
sukham vane nivatsyāmi yathā eva bhavane pituḥ |acintayantī trīml lokāmaḥ cintayantī pati vratam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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