वाल्मीकि रामायण 2.3.32
आरुरोह नृपं द्रष्टुं सह सूतेन राघवः ।स प्राञ्^जलिरभिप्रेत्य प्रणतः पितुरन्तिके॥
āruroha nṛpaṃ draṣṭuṃ saha sūtena rāghavaḥ |sa prāñ^jalirabhipretya praṇataḥ piturantike ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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